सर्दियों में नहीं बरसे बादल, तो रो पड़ा हिमालय
चमोली (उत्तराखंड)। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इस वर्ष सर्दी का मौसम अपने स्वभाव से बिल्कुल अलग दिखाई दिया। दिसंबर–जनवरी बीत जाने के बावजूद न बारिश हुई और न ही बर्फ़बारी। जिस सर्दी में कभी खेतों को जीवन देने वाली नमी मिलती थी, वह इस बार पूरी तरह नदारद रही। इसका सबसे गहरा असर हिमालय की गोद में बसे किसानों पर पड़ा है, जो आज अपनी ही ज़मीन पर खेती करने में असमर्थ नज़र आ रहे हैं।
सर्दियों की बारिश उत्तराखंड की रबी फसलों के लिए बेहद आवश्यक मानी जाती है। गेहूं, जौ, सरसों और दालों की खेती इसी नमी पर निर्भर रहती है। लेकिन इस साल खेत सूखे पड़े हैं। मिट्टी इतनी कठोर हो चुकी है कि कई जगहों पर किसान हल तक नहीं चला पा रहे। बोआई का समय निकलता जा रहा है और किसानों की चिंता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पहाड़ों के पारंपरिक जलस्रोत भी जवाब देने लगे हैं। नौले, धारे और गधेरे सूखते जा रहे हैं। सिंचाई के आधुनिक साधनों की कमी पहले से ही पहाड़ी खेती की बड़ी चुनौती रही है, और जब बारिश भी न हो, तो किसान के सामने कोई विकल्प नहीं बचता। इस पूरे हालात के पीछे विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण मान रहे हैं। मौसम का चक्र असंतुलित हो चुका है। कभी अत्यधिक वर्षा और आपदाएँ, तो कभी लंबे समय तक सूखा—ये सभी बदलती जलवायु के संकेत हैं। हिमालय जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव और भी खतरनाक साबित हो रहा है।
इस विषय पर पर्यावरण प्रेमी शिव सिंह फर्स्वाण का कहना है,
“हिमालय आज खामोश होकर रो रहा है। सर्दियों में बारिश न होना सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है। हमने वर्षों तक जंगलों का अंधाधुंध दोहन किया, जलस्रोतों को नज़रअंदाज़ किया और प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ा। आज उसी का खामियाजा किसान भुगत रहा है।”
वे आगे कहते हैं, “यदि समय रहते जल संरक्षण, वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ की खेती पूरी तरह संकट में पड़ जाएगी।” यह समस्या केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और पहाड़ों से बढ़ते पलायन का संकट भी जुड़ा हुआ है। जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन और किसानों को त्वरित सहायता देने की दिशा में ठोस कदम उठाएँ। आज हिमालय का यह दर्द एक चेतावनी है। यदि इसे अब भी अनसुना किया गया, तो आने वाले समय में सूखे खेत केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता बन जाएंगे
