चमोली (उत्तराखंड)। ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। इसके दुष्प्रभाव सबसे अधिक हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिल रहे हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है।
हिमालय के ग्लेशियर जो कभी स्थिर माने जाते थे, आज तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं। इसका सीधा असर नदियों के जलस्तर, कृषि, जैव विविधता और मानव जीवन पर पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएँ आम होती जा रही हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का ताज़ा और भयावह उदाहरण उत्तरकाशी ज़िले का धराली क्षेत्र है। यहाँ अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और आसपास के ग्लेशियरों के पिघलने से अचानक बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति बनी। इस आपदा में जन-धन की भारी क्षति हुई और स्थानीय पर्यावरण को गहरा नुकसान पहुँचा। धराली की घटना यह स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की कड़वी सच्चाई बन चुका है।
उत्तराखंड में इससे पहले भी केदारनाथ, जोशीमठ, चमोली और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित निर्माण कार्य, सड़क चौड़ीकरण और सुरंग परियोजनाओं ने पर्वतीय ढांचे को और अधिक कमजोर किया है। जब इन मानवीय गतिविधियों का प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ता है, तो परिणाम विनाशकारी होता है।
इस विषय पर पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को लेकर लगातार जागरूकता फैलाने वाले शिव सिंह फ़र्स्वाण का कहना है कि यदि विकास कार्यों में पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया, तो भविष्य में धराली जैसी आपदाएँ और अधिक भयावह रूप ले सकती हैं। उन्होंने आम जनता से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलने और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की।
सार:
धराली (उत्तरकाशी) सहित हिमालयी क्षेत्रों में घट रही आपदाएँ ग्लोबल वार्मिंग की गंभीर चेतावनी हैं। अब भी यदि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।
