जोशीमठ / चमोली (उत्तराखंड)। उत्तराखंड की पहचान माने जाने वाले बर्फ़ीले पहाड़ और साहसिक खेलों का प्रसिद्ध केंद्र औली इस वर्ष जनवरी माह में एक दर्दनाक सच्चाई बयां करता नज़र आया। जिस औली में इस मौसम में बर्फ़ की मोटी चादर बिछी रहती थी, वहाँ इस बार सूखी धरती और वीरान ढलानें देखने को मिलीं। यह दृश्य न केवल पर्यटकों के लिए निराशाजनक है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के गहराते संकट की गंभीर चेतावनी भी है।
स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 2023 में जनवरी के महीने में औली में जमकर बर्फ़बारी हुई थी। चारों ओर सफ़ेदी, स्कीइंग का रोमांच और पर्यटकों की चहल-पहल रहती थी। लेकिन जनवरी 2026 में हालात बिल्कुल उलट दिखाई दिए। बर्फ़ न गिरने से औली की प्राकृतिक सुंदरता फीकी पड़ गई है और साहसिक खेल लगभग ठप हो गए हैं।
पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन पर लगातार जागरूकता फैलाने वाले शिव सिंह फर्स्वाण ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि औली में बर्फ़ का अभाव हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते जलवायु स्वरूप का स्पष्ट संकेत है। उन्होंने बताया कि बढ़ता तापमान, वनों की कटाई, अनियंत्रित विकास और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है।
हर वर्ष देश-विदेश से हजारों पर्यटक केवल बर्फ़ देखने और साहसिक खेलों का आनंद लेने औली आते हैं। इस बार बर्फ़ न होने से पर्यटक मायूस नज़र आए और पर्यटन से जुड़े स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
शिव सिंह फर्स्वाण ने कहा कि यह समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस और सामूहिक प्रयास करने का है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ औली की बर्फ़ को केवल तस्वीरों और यादों में ही देख पाएँगी। औली की सूखी धरती आज पूरे समाज से एक सवाल कर रही है— क्या अब भी हम प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा करते रहेंगे?
