चमोली (उत्तराखंड)। शहरों में बढ़ता कूड़ा अब केवल गंदगी की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को तेज़ी से बढ़ाने वाला गंभीर संकट बन चुका है। शहर के बीचों-बीच बने कूड़ा डंपिंग ज़ोन से उठती तीखी बदबू और जहरीली गैसें लोगों को मुंह ढककर चलने पर मजबूर कर रही हैं। ऐसे इलाकों से गुजरना ही नहीं, वहां रहना भी स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है।
खुले में पड़ा कचरा वायु को प्रदूषित कर रहा है, वहीं बरसात के मौसम में कूड़े से निकलने वाला जहरीला पानी जमीन में समाकर मिट्टी और भूजल को दूषित कर रहा है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। मच्छर, मक्खियां और संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
कूड़े के ढेरों में फैला प्लास्टिक सबसे मूक पीड़ा गौवंश को दे रहा है। खुले कूड़े में भोजन की तलाश में पहुंचने वाली गायें अनजाने में प्लास्टिक थैलियां, पैकेट और अन्य अपशिष्ट निगल लेती हैं। इससे उनके होंठ, मुंह और पाचन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचता है। कई मामलों में प्लास्टिक से होंठों में घाव, सूजन और संक्रमण हो जाता है, वहीं पेट में जमा प्लास्टिक धीरे-धीरे उनकी मृत्यु का कारण भी बन रहा है। यह स्थिति न केवल पशु क्रूरता का उदाहरण है, बल्कि हमारी उपभोक्तावादी लापरवाही का भी आईना दिखाती है।
इस गंभीर स्थिति पर पर्यावरण मित्र शिव सिंह फ़र्स्वाण का कहना है कि कूड़े के ढेरों में सड़ता जैविक कचरा मीथेन जैसी घातक ग्रीनहाउस गैस छोड़ता है, जो वैश्विक तापमान बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। वहीं प्लास्टिक कचरे का खुले में जलाया जाना कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य विषैली गैसों का उत्सर्जन बढ़ाकर वातावरण को और जहरीला बना रहा है। इस तरह कूड़ा प्रबंधन की लापरवाही सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन को तेज कर रही है।
इन हालातों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है—बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखते जल स्रोत और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति की स्पष्ट चेतावनी हैं। यदि समय रहते कूड़ा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य बचाना कठिन हो जाएगा।
पर्यावरण संरक्षण के लिए कूड़े का स्रोत पर ही पृथक्करण, प्लास्टिक पर सख्त नियंत्रण, वैज्ञानिक कचरा निपटान, खुले में कूड़ा जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध, गौवंश संरक्षण और जनभागीदारी को बढ़ावा देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कूड़ा यदि आज नहीं संभाला गया, तो यही कल जलवायु संकट बनकर मानव अस्तित्व को चुनौती देगा।
