देवाल (चमोली)। देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले के देवाल क्षेत्र में इन दिनों जंगलों में लगी आग केवल एक घटना नहीं, बल्कि मानव की संवेदनहीनता का जलता हुआ सच बन चुकी है। पहाड़ों की गोद में फैले हरे-भरे जंगल धुएँ और लपटों में घिरे हैं। जो जंगल कभी जीवन देते थे, आज वही जंगल राख में बदलते जा रहे हैं और इंसान मूकदर्शक बना खड़ा है।
इस आग की चपेट में आकर पेड़-पौधे, जंगली जानवर, पक्षी और अनगिनत छोटे जीव तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। वे बोल नहीं सकते, अपनी पीड़ा कह नहीं सकते, बस खामोशी से जल जाते हैं। जंगलों से उठता धुआँ सिर्फ आसमान को नहीं ढक रहा, बल्कि मानवता की आंखों पर भी पर्दा डाल रहा है। कभी जहां हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट थी, आज वहां सन्नाटा और आग की लपटें हैं।
पर्यावरण प्रेमी शिवम फ़र्स्वाण का कहना है कि जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग कहीं न कहीं मानव की लापरवाही और स्वार्थ का परिणाम है। समय रहते अगर हम नहीं जागे, तो इसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। यह आग केवल जंगलों को नहीं जला रही, बल्कि जलवायु परिवर्तन को और तेज़ कर रही है, मौसम चक्र को बिगाड़ रही है और जीवन के आधार को कमजोर कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रकृति खुलकर रो रही है, तब भी इंसान क्यों नहीं जाग रहा? क्या तब जागेगा जब जंगल खत्म हो जाएंगे, जीव-जंतु मिट जाएंगे और सांस लेने को शुद्ध हवा भी नहीं बचेगी? यह खबर सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन और चेतावनी है। अगर आज भी नहीं संभले, तो देवभूमि की यह आग कल हमारे भविष्य को भी राख में बदल देगी।
