जलवायु परिवर्तन से सूखे जंगल और भूखे भालू
चमोली। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इन दिनों भालुओं के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों के जीवन को असुरक्षित बना दिया है। जंगलों से सटे गाँवों में भालू दिनदहाड़े दिखाई दे रहे हैं और खेतों, घरों और स्कूलों के आस-पास घुसकर डर फैल रहे हैं। किसान खेतों में जाने से डर रहे हैं, महिलाएँ घास और लकड़ी लेने नहीं जा पा रही हैं और कई छात्र भी भालू के हमलों की चपेट में आ चुके हैं।
पर्यावरण प्रेमी शिव सिंह फर्स्वाण का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने जंगलों का संतुलन बिगाड़ दिया है इस साल सर्दियों में बारिश की कमी और जंगलों में फल-फूल न लगने के कारण भालू जंगलों में खाने और पानी की कमी का सामना कर रहे हैं, और यही वजह है कि भूखे भालू अब गाँवों की ओर आने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि “जंगल में भोजन और पानी की कमी के कारण भालू अब निचले इलाकों में आ रहे हैं और इससे ग्रामीणों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है।” ग्रामीणों का कहना है कि डर के कारण कई परिवार अपने पुराने घर छोड़ने और पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं। मवेशियों की देखभाल और खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का स्थायी समाधान केवल डर में जीने या गाँव छोड़ने में नहीं है। ग्रामीणों को समूह में खेत और जंगल जाना चाहिए, बच्चों की विशेष निगरानी करनी चाहिए और किसी भी भालू की गतिविधि की तुरंत वन विभाग को सूचना देनी चाहिए। वहीं प्रशासन को संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त, जंगलों में पानी और भोजन की व्यवस्था, गाँवों के आसपास सुरक्षा उपाय और प्रभावित परिवारों को समय पर मुआवज़ा सुनिश्चित करना चाहिए। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो भालू और इंसान के बीच टकराव बढ़ता रहेगा।
